कोटा का इतिहास बहुत पुराना है ,वैसे तो कोटा 1631 ई.मे स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था । लेकिन कोटा का इतिहास बूंदी राज्य से जुड़ा हुआ है कोटा इससे पहले बूंदी राज्य के अधीन था ! कोटा का नाम कोटिया भील के नाम पर रखा गया है जो कोटा का राजा हुआ करता था , कोटिया भील को बूंदी के राजकुमार जैतसिंह ने मार कर कोटा की स्थापना की ओर कोटा को बूंदी राज्य मे मिलाया ! बाद मे 1631 ई मे कोटा बूंदी राज्य से अलग होकर एक स्वतंत्र राज्य बना ओर राव माधोसिंह कोटा के पहले महाराजा बने !

इस क्षेत्र मे चंबल नदी के किनारे किनारे आदिम युगीन ओर प्रस्तर युगीन के प्रमाण अधिक मात्रा मे मिले है कोटा जिले की पहड़ियों मे बनी प्राकृतिक गुफाओ मे भी शेल चित्र मिले है !कोटा जिले के आस पास के क्षेत्र करकोट नगर ( टोंक जिला ) से मालवा शासकों के 150 ई.पू. से 100 ई.पू. के सिक्के बहुत अधिक मात्रा मे प्राप्त हुए है प्राप्त प्रमाणों से अनुमान होता है कि मालवों का उस समय बहुत बड़े भू भाग पर अधिकार था ओर वर्तमान कोटा का क्षेत्र भी मालवा गणराज्य का हिस्सा था ! प्राप्त प्रमाणों से पता चलता है कि इस क्षेत्र पर मोखरी वंश का भी शासन रहा था ,कोटा जिले का बड़वा गाँव मोखरीं वंश के राजा बल की राजधानी थी ,बड़वा उस समय एक समृद्ध नगर रहा होगा !मोखरी वंश ने वर्तमान हाड़ोती प्रांत पर तीसरी शती के अंत तक राज्य किया ! बाद मे गुप्त साम्राज्य के उदित होने पर मोखरी राज्य ओर मालवा गण राज्य गुप्त साम्राज्य मे विलीन हो गए ,कोटा जिले के चारचौमा से गुप्तकालीन मंदिर मिला है जिसमे गुप्तकालीन लिपि ओर संस्कृत भाषा के लेख मिले है ,दरे की नाल से भी दो गुप्तकालीन मंदिर खंडर अवस्था मे मिले है !
शेरगढ़ से नागवंशी राजा का 870 विक्रम सवत (813 ई ) का शिलालेख मिला है, 790 ई का सामंत देवदत्त का एक शिलालेख भी शेरगढ़ से प्राप्त हुआ है इस शिलालेख मे उसके 3 पूर्वजों के नाम दिए गए है जिनके नाम के आगे नाग लगा हुआ है , अतः अनुमान होता है के गुप्तों के पतन के बाद नगवंशी राजाओ ने इस क्षेत्र पर अपना शासन स्थापित किया , वे मोर्य साम्राज्य के अधीन शासन करते थे
मौर्यो के पतन के बाद इस क्षेत्र पर धार के परमारों का अधिकार हो गया , परमारों के क्षीण हो जाने के बाद भीलों ओर मीणाओ ने अपनी शक्ति बढ़ाई ओर बान्दो घाटी (बूंदी ) तथा ढूढाड़ (जयपुर ) मे शक्तिशाली राज्य स्थापित कर लिए । इन मीणाओ की पड़ोसी राजाओ से लड़ाई होती रहती थी ! इनके पड़ोसी राजा दक्षिण मे भील ,उत्तर मे कछवाहे , पूर्व मे खींची तथा बंबावदा क्षेत्र मे चोहानों के राज्य थे
जेता मीणा , बान्दो घाटी (बूंदी ) के मीणाओ का बड़ा शक्तिशाली राजा था ! जेता मीणा , बूंदा मीणा का पौत्र था ! बूंदा मीणा के नाम पर ही बूंदी का नाम ‘बूंदी’ पड़ा ! जेता मीणा ने अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए अभिमान मे आकर अपने पड़ोसी चौहान राजा बंगदेव ( हाड़ा शाखा के ) से कहलवाया के वह अपनी पुत्रियों का विवाह जेता के पुत्रों के साथ कर दे , इस बात पर बंगदेव को बहुत अपमानित महसूस हुआ ओर क्रोधित होकर उसने अपने पुत्रों देवसिंह ओर जसकरण ( जसराज ) के साथ मिलकर षड्यंत्र के तहत जेता से कहलवाया के जसकरण की पुत्रियों के साथ तुम्हारे पुत्रों का विवाह किया जा सकता है
बूंदी के पास उमरथुण नामक गाव मे विवाह रखा गया ओर जब जेता वहाँ आया तो देवसिंह ने अपनी छुपी हुई सेना के साथ आक्रमण कर के मीणाओ का सर्वनाश कर दिया ! देव सिंह ने आषाढ़ कृष्ण नवमी वि.संवत 1298 ( 1241 ई )को बंदों घाटी मे प्रवेश किया ( वंश भास्कर के अनुसार ) , जेम्स टोड ने यह तिथि 1342 मानी है ! इस प्रकार देवसिंह ने जेता मीणा को मारकर बूंदी राज्य की स्थापना की !

लगभग 1300 ई. मे बूंदी के राजा देव सिंह ( राजा देवा ) ने सन्यास ले लिया, ओर उसका बड़ा बेटा समर सिंह राजगदी पर बैठा ! समर सिंह ने अपने राज्य का विस्तार किया ओर कैथून , सिसवाली, बडौद , रामगढ़ ,मऊ ,संगोद आदि मीणाओ ,पवारों , भीलों से छिन ली !
कोटा , अकेलगढ़ मे भीलों का शक्तिशाली राज्य स्थापित था जो मनोहर थाना तक फेले थे ! जब हाड़ाओ ओर भीलों की सीमा आपस मे टकराने लगी तो दोनों ताकतों के बीच मे टकराओ पैदा होने लगा ! समर सिंह के पुत्र जैतसिंह ने अपने ससुर ( कैथून के तंवर सरदार ) की मदद से भीलों को छल से मार दिया , इस युद्ध मे कोटा का सरदार कोट्या भील मारा गया ! कोट्या भील को हराकर जैतसिंह ने कोटा की स्थापना की ! कोटा का नाम कोटिया भील के नाम पर रखा गया है
जैत सिंह अपने भाई नापूजी (नरपाल ) बूंदी के राजा के लिए लड़ता हुआ युद्ध क्षेत्र मे मारा गया , राजकुमार जैतसिंह के मरने के बाद जैतसिंह का पुत्र सुर्जनसिंह कोटा पर राज करने लगा !बूंदी के राजा हमीर सिंह के बाद ओर बर सिंह के शासन काल मे बूंदी ओर कोटा की हालत बहुत बुरी हो गई ,इनपर अनेक आक्रमण होने लगे ! ई. 1432 मे गुजरात के अहमद शाह ओर 1446 ई. मे मालवा के महमूद शाह ने यहा आक्रमण किए !
सुरजन सिंह के पुत्र धीरदेह के वंशजों मे 15 वी शती मे जेतावत राय कोटा का राजा हुआ उसके बाद उसका पुत्र वीरम देव कोटा का राज्य संभालने लगा ,वीरम देव ज्यादा तर बूंदी की सेवा मे रहता था ओर कोटा की रक्षा के लिए उसके छोटे भी कन्ह को छोड़ जाता था ,कन्ह एक अयोग्य व्यक्ति था , अतः मोका देख कर 1546 ई मे केसर खा ओर डोकर खा नामक दो पठान सैनिकों ने कोटा को अपने अधिकार मे ले लिया !
16 वी शताब्दी मे बूंदी की गदी पर एक प्रतापी राजा बैठा राव सुर्जन सिंह हाड़ा ! उसने बूंदी को अपना खोया हुआ गोरव वापस दिलाया , उसने कोटा को पठानों से मुक्त करवाया जो वर्षों तक उनके अधिकार मे था !वीरम देव के बाद ही कोटा पर जैतसी के वंश का इतिहास समाप्त हो गया , सुर्जन सिंह ने कोटा को पुनः बूंदी मे मिलाया जो जैतसिंह के बड़े भाई नापू सिंह ( नरपाल ) के वंश का था , जो बूंदी का राजा था !
1569 ई. मे सुर्जन सिंह ने कुछ शर्तों के साथ अकबर से संधि कर ली ओर कोटा ,बूंदी मुगल साम्राज्य के अजमेर सूबे मे शामिल हो गए !
1585 ई. मे सुर्जन सिंह हाड़ा के मरने के बाद उसके छोटे पुत्र हृदयनारायण ने कोटा पर शासन किया , बाद मे 1624 ई. मे खुर्रम (शाहजहाँ ) ने अपने पिता जहांगीर से बगावत की तो बूंदी के राजा राव रतन ओर उसके भाई कोटा के हृदयनारायण ने जहांगीर का साथ दिया , लेकिन हृदयनारायण युद्ध बीच मे छोड़ के भाग आया इससे नाराज होकर जहांगीर ने कोटा राव रतन को सौप दिया ओर उसका पुत्र राव माधोसिंह कोटा पर शासन करने लगा !
राव माधोसिंह हाड़ा स्वतंत्र कोटा के पहले महाराजा बने ! जब खुर्रम (शाहजहाँ ) राव रतन सिंह की कैद मे था तब माधोसिंह ने उससे अच्छा व्यवहार किया ओर अच्छी मित्रता बना ली , 1627 ई मे जहांगीर के मरने के बाद खुर्रम (शाहजहाँ ) बादशाह बना ! 1631 ई. मे शाहजहाँ ने कोटा को बूंदी से अलग कर एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया ओर राव माधोसिंह स्वतंत्र कोटा के पहले महाराजा बने ! बादशाह ने इन्हे 2500 का मनसब दिया जिसे बाद मे बड़ा कर 3000 कर दिया !
कोटा नरेश राव माधोसिंह ने मुगलों की बहुत सेवा की ! ओर अनेक अभियानों मे मुगलों का प्रतिनिधित्व किया ! बल्ख और बदख्शां के अभियानों मे शहजादा मुराद के साथ माधोसिंह को भी भेजा , वहा माधोसिंह ने अच्छी कीर्ति ओर वैभव हसिलं किया , मुराद माधोसिंह को छोड़ के हिन्दुस्थान आ गया ,जब शाहजहाँ ने माधोसिंह की वीरता और साहस की प्रशंसा सुनी तो उसको लाने के लिए चांदी व आभूषणों से अलंकृत ‘बाद-रफ्तार’ नामक घोड़ा भेजा। कोटा लौटने पर 1648 ई. में लगभग 48 वर्ष की अवस्था में उसकी मृत्यु हो गयी।
जब माधोसिंह राजा बने थे तब कोटा राज्य मे 14 परगने थे उनकी मृत्यु तक कोटा राज्य मे 33 परगने हो गए थे ! माधोसिंह के 7 रानिया 5 पुत्र थे जिसमे सबसे बाद पुत्र का नाम मुकुंद सिंह था ,मुकुंद सिंह की माता बागमदे उदयपुर की महाराणा की बेटी थी
माधोसिंह ने कोटा मे गढ़ पैलेस का निर्माण करवाया , माधोसिंह के शासन काल मे ही कोटा मे बड़ा महल , राजमहल के आगे हौद नक्कारखाने का दरवाजा , सैलारगाजी का दरवाजा ,कैथूनीपोल ,पाटनपोल ओर किशोरपुरा के दरवाजे के कोठे का निर्माण हुआ है !

मुकुंद सिंह को शाहजहाँ ने 3000 का मनसब दिया ओर 2000 सवारों का अधयक्ष बनाया ! मुकुंद सिंह के 10 रानिया थी ! मुकुंद सिंह की एक प्रेमिका थी जिससे उसकी भेट जंगल मे हुई जब महाराजा शिकार खेलने गए थे ! उस स्त्री का नाम अबली मीणी था ! राजा की प्रियतमा बनते समय उसने एक शर्त राखी के दर्रे की पहाड़ी पर उसके लिए एक महल बनवाया जाए और उसने हर रात ऐसा दीपक जले जो अबली के गाँव से सबको दिखाई दे ! मुकुंद सिंह ने उसके लिए एक महल , उद्यान का निर्माण करवाया !जिसे अबली मीणी का महल के नाम से जाना जाता है अबली मीणी के महल को हाड़ौती का ताजमहल कहा जाता है ! कहा जाता है के अंग्रेजी अधिकारी कनिघंम के समय तक यहाँ दीपक जलता था ! मुकुन्दसिंह ने अन्ता का महल’ और कोटा के दुर्ग की दीवारे भी बनवाई।
जब शाहजहाँ के बेटों मे मुगल साम्राज्य के लिए घमासन युद्ध हुए तो मुकुंद सिंह ने उत्तराधिकारी दारा का साथ दिया ! ओर धरमत की लड़ाई मे अपने चार भाइयों मोहनसिंह, जुझारसिंह, कन्डोराम व किशोरसिंह के साथ 5000 की सेना लेकर पहुँचा ! उस युद्ध मे औरंगजेब की जीत हुई और उस युद्ध मे मुकुंद सिंह मारा गया , उसका भाई किशोर सिंह बुरी तरह घायल हो गया लेकिन उसके प्राण बच गए !
मुकुंद सिंह की मरने के बाद उसका पुत्र जगत सिंह कोटा का महाराज बना , जब वह कोटा की गद्दी पर बैठा तब उसके उम्र 14 वर्ष की थी ! औरंगजेब जब राजा बना तो उसे जगत सिंह को दिल्ली बुलाया , औरंगजेब से मिलने के बाद जगत सिंह को उसने अपने भाई शुजा के विरुद्ध युद्ध मे झौंक दिया उस समय जगत सिंह मात्र 15 वर्ष का था , उसका चाचा भी किशोर सिंह भी उसके साथ युद्ध क्षेत्र मे था , इस युद्ध मे औरंगजेब विजय हुआ !
जगत सिंह औरंगजेब के साथ दक्षिण के अभियानों मे रहा ओर 1684 ई. दक्षिण मे युद्ध मे उसकी मृत्यु हो गई ! उस समय किशोर सिंह भी उसके साथ था !
जगत सिंह निः संतान मरा इसलिए उसका चाचा किशोर सिंह कोटा की गद्दी पर बैठा , वह दक्षिण से कोटा आया ओर राजतिलक करवाकर वापस दक्षिण लौट गया ! किशोर सिंह ने अपने छोटे बेटे रामसिंह को कोटा का उत्तराधिकारी बनाया ओर बड़े बेटे बिशन सिंह जो अंता की जागीर दी ! किशोर सिंह ने अपना सारा जीवन औरंगजेब के लिए दक्षिण मे लड़ते हुए मिटाया और अरकट की लड़ाई मे मारा गया ! उस समय रामसिंह दक्षिण मे था तो बिशन सिंह ने कोटा पर अधिकार जमा लिया , लेकिन राम सिंह शाही सेना के साथ दक्षिण से आया ओर आँवा मे हुए युद्ध मे बिशन सिंह को हराकर कोटा का राजा बना !
राम सिंह राजा बनने के बाद वापस दक्षिण के अभियान मे लौट गया ! राम सिंह ने धूर्त , मक्कार , ओर हिन्दू विरोधी क्रर बादशाह की सेवा मे लगे रहे ! राम सिंह ने अनेक युद्ध जीते ओर बड़ा नाम कमाया ! राम सिंह ने अपने तोपखाने के दम पर अनेक युद्धों को जीता और अपने दुश्मनों को भून कर रख देता था इस कारण उसका नाम भड़बुज्या नाम से प्रसिद्ध हुआ !
औरंगजेब के पुत्रों के बीच हुआ युद्ध मे राम सिंह ने आजम का साथ दिया जबकि बूंदी नरेश बुध सिंह हाड़ा ने मुअज्जम का साथ दिया ! इस युद्ध मे राम सिंह की मृत्यु (1707 मे) हो गई ! मुअज्जम बहादुर शाह के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा !
राम सिंह हाड़ा के समय रामपुर बाजार बसा , रामपुर का कोट ओर दरवाजा बना , सूरज पोल का निर्माण , रामगंज और रांवठा बसे , रांवठा के तालाब का निर्माण और रामनिवास बाग बना ! कोटा का परकोटा रामसिंह के शासन काल मे बनना प्रारंभ हुआ !
राम सिंह के बाद उसका पुत्र भीम सिंह (1707 ई .) कोटा का राजा बना !

जब मुअज्जम दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो बुध सिंह हाड़ा ने कोटा पर अधिकार करने के लिए मुअज्जम के आज्ञा लेकर कोटा पर दो बार आक्रमण किया लेकिन दोनों बार भीम सिंह ने उसे हरा कर भागा दिया ! बूंदी पर अधिकार जमाने के बाद भीम सिंह ने करवर पर भी हमला कर दिया लेकिन किसी साधु के कहने पर पर उसमे करवर से अपना घेरा हटा लिया और वापस आ गया ! करवर का जागीरदार सलामसिंह था !
बाद मे जब दिल्ली की गद्दी पर फर्रूखसियर बैठा तो उसने कोटा महाराजा भीम सिंह का साथ दिया और भीम सिंह ने 1713 ई. मे बूंदी पर हमला कर अधिकार कर लिया और बुध सिंह अपने मामा के पास भाग गया !
बाद मे 1716 ई. बुद्ध सिंह के साले जयपुर नरेश जयसिंह ने फर्रूखसियर से कहकर भीम सिंह से बूंदी बुद्ध सिंह को वापस दिलवा दी ओर जयसिंह ने दोनों मे सुलह कारवाई !
1719 ई. मे जब सभी राजा दिल्ली मे शिवर लगाए हुए थे तब भीम सिंह ने अपने और उसके सहयोगी राजाओ ने बुद्ध सिंह को मारने के लिए उसमे हमला किया लेकिन वह वहाँ से भाग निकला ! जब भीम सिंह कोटा से दिल्ली लौट रहा था तो वह श्री कृष्ण के दर्शन के लिए वृंदावन गया और वहाँ भगवान कृष्ण की भक्ति मे डूब गया ! उसका हृदय परिवर्तन हो गया उसमे अपना खुद का नाम बदल कर कृष्णदास रख लिया और कोटा का नाम नन्द गाँव और शेरगढ़ का नाम बरसाना कर दिया !
भीम सिंह की गैरहाजरी मे सलामसिंह ने कोटा पर आक्रमण कर बहुत आतंक फैलाया ! जब यह सूचना भीम सिंह को मिली तो उसे बहुत क्रोध आया और वह वैराग्य त्याग कर अपने राज्य और प्रजा की रखा के लिए कोटा आया !
भीम सिंह ने सलामसिंह पर आक्रमण किया ,वह हारकर जान बचाकर बूंदी भाग गया , भीम सिंह ने बूंदी पर हमला कर दिया लेकिन सलामसिंह वहाँ से भी भाग निकला ! भीम सिंह का अधिकार बूंदी पर हो गया !
भीम सिंह ने बूंदी को पूरी तरह कोटा राज्य मे मिल दिया , उसने बूंदी के महल का छत्र हटा कर उसे कोटा के राजमहल के ऊपर लगाया ! उसने अपने धा भाई भगवानदास को बूंदी मे अपने प्रतिनिधि के रूप मे नियुक्त किया ! भीमसिंह ने बूंदी की दो तोपे धूल धाणी और कड़कबिजली भी कोटा दुर्ग मे लगवाई !
भीम सिंह के समय कोटा राज्य बहुत फेला और उसकी प्रतिष्ठा , मान और शक्ति भी प्रबल हुई ! इस समय कोटा राज्य क्षेत्रफल मे उदयपुर और जोधपुर राज्यों की बराबरी के समीप आ गया था जबकि आमेर कोटा राज्य से छोटा रह गया था !
भीमसिंह ने अनेक निर्माण भी करवाए , उसमे कोटा राज्य मे टकसाल लगवाई ओर अपने सिक्के भी चलवाए ! बाराँ मे सांवलाजी का मंदिर , कोटा मे आशा पूरी मंदिर , ब्रज मंदिर , कृष्ण भंडार , बारह दरी के नीचे का कृष्ण महल , सलह खाने का महल ,भीम विलास , भीमगढ़ का किला तथा अनेक मंदिर , बावड़ियों का निर्माण करवाया !
भीमसिंह को उदयपुर महाराणा ने महाराव की उपाधि दी थी और इन्हे मुगलों से 5000 का मनसब भी प्राप्त था !
महाराजा भीम सिंह के मरने के बाद उनका सबसे बड़ा बेटा अर्जुनसिंह 1720 ई. मे कोटा का राजा बना ! भीम सिंह के मरने के बाद उसका धा भाई भगवंतदास भी बूंदी वापस बुद्ध सिंह को सौंप कर कोटा आ गया ! अर्जुन सिंह कोटा पर 3 वर्ष ही शासन कर सका और 1724 मे उसकी मृत्यु हो गई ! उसके बाद उसका सबसे छोटा भाई दुर्जनशाल कोटा की गद्दी पर बैठा , इससे उसका भाई श्यामसिंह नाराज होकर जयपुर गया और सवाई जयसिंह की सेना लेकर कोटा पर आक्रमण करने आया और मार गया ! उसकी मरने पर महाराजा दुर्जनशाल ने बहुत विलाप किया और उसकी स्मृति मे रणक्षेत्र मे एक छतरी भी बनवाई !
इस समय हिन्दुस्थान मे बहुत उथल पुथल का माहौल था ! मुगल साम्राज्य का लगभग पतन हो चुका था ! मराठाओ ने अपना शिकंजा सारे देश मे कस लिया था और अंग्रेज भी अपना साम्राज्य जमाने की और अग्रसर थे !
दिल्ली के बादशाह ने बाजीराव पेशवा को कोटा दे दिया था ,बाजीराव दुर्जनशाल से पैसे लेने लगा ! मराठों से परेशान होकर दुर्जनशाल ने उनकी अधीनता स्वीकार कर ली ! कोटा राज्य 1737 ई. मे मराठों के अधीनता मे आ गया और मराठों को खण्डणी देने लगा था ! मराठों के प्रतिनिधि बालाजी यशवंत नामक कोंकण सारस्वत ब्राह्मण कोटा के दरबार मे नियुक्त हुए !
जब जयपुर नरेश ईश्वरीसिंह था तब दुर्जनशाल ने बूंदी पर आक्रमण कर उसे अधिकार में ले लिया ! दुबारा ईश्वरीसिंह ने मराठाओ के साथ मिलकर कोटा पर आक्रमण किया ! और बाद मे इसने बीच समझौता हो गया !
1756 ई मे दुर्जनसिंह की मृत्यु हो गई !इसके कोई संतान नहीं थी इसलिए अजित सिंह को राजा बनाया गया जो बिशन सिंह का वंशज था ओर अंता का जागीरदार था !
अजीत सिंह को बिना मराठों से पूछे राजा बनाना मराठों को पसंद नहीं आया ! बाजीराव पेशवा ने कोटा राज्य सिंधिया , होल्कर और पँवारों को सयुक्त जागीर के रूप मे दिया था उससे प्राप्त सारा धन यह आपस मे बांटते थे ! अतः यह सभी कोटा पर आक्रमण करने आए ! तभी दुर्जन सिंह की रानी जो उदयपुर महाराणा की पुत्री थी उसने रणोजी सिंधिया का राखी भेज कर कहा की अजित सिंह को मेरा बेटा मानकर कोटा का राजा समझा जाए ! मराठों ने शर्त रखी कि अगर अजीत सिंह 10 -10 लाख रुपए की चार किश्त हर वर्ष नियमित चुकाये तो उसे कोटा का राजा बना जाएगा ! शर्ते मान ली गई और अजीत सिंह राजा बना ! 1758 ई. उसकी रुपयों की चिंता मे उसकी मृत्यु हो गई ! अजीतसिंह के बाद उसका पुत्र शत्रुशाल राजगद्दी पर बैठा तब भी मराठों ने उससे नजराने के रूप मे 2 लाख रुपए लिए !

जयपुर नरेश माधोसिंह ने कोटा नरेश शत्रुशाल के समय कोटा के विरुद्ध विशाल सेना भेजी ! लेकिन कोटा के सेनापति ने उनको हरा कर भगा दिया ! इस समय झाला जालिम की आयु मात्र 21 वर्ष थी ! इस युद्ध से झाला जालिमसिंह कोटा राज्य का एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गया और उसकी प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती चली गई !
शत्रुशाल की मृत्यु 1764 ई. मे 6 वर्ष का शासन करके हो गई ! उसके बाद उसका छोटा भाई गुमानसिंह कोटा की राज गद्दी पर बैठा ! गुमान सिंह की मृत्यु भी 1771 मे हो गई ! उसके बाद उसका बेटा उम्मेद सिंह 10 वर्ष की आयु मे कोटा का महाराजा बना !
कोटा राज्य पर झाला जालिम सिंह महाराजा शत्रुशाल के समय फौजदार बना लेकिन उम्मेद सिंह का शासनकाल आते आते कोटा राज्य मे झाला जालिम सिंह का प्रभाव इतना बढ़ गया कि महाराजा नाममात्र के रह गए जबकि झाला जालिम सिंह अपनी चतुराई और प्रभाव से कोटा राज्य का वास्तविक शासक बना रहा !
भले ही झाला जालिम सिंह कोटा का राजा नहीं रहा हो लेकिन यह भी सच्चाई है की अगर कोटा राज्य को जालिम सिंह जैसा व्यक्ति नहीं मिला होता तो कोटा राज्य को जयपुर , मराठा , पिंडरी या अग्रेज मे से कोई भी बड़ी शक्ति कोटा राज्य को हड़प लेती ! इसलिए कोटा राज्य के इतिहास मे झाला जालिम सिंह का महत्वपूर्ण स्थान है ! अतः कोटा के सम्पूर्ण इतिहास को जानने के क्रम मे आपको झाला जालिम सिंह को पढ़ना भी जरूरी है —
1819 मे उम्मेद सिंह की मृत्यु के बाद उसका बड़ा बेटा किशोर सिंह कोटा का राजा बना वही जालिम सिंह 80 साल का हो गया था इसलिए उसने अपने पुत्र माधोसिंह को अपनी जगह कोटा का फौजदार बनाया ! किशोर सिंह ने झाला जालिम सिंह के अधिकारों को चुनौती दी और राजकुमार पृथ्वी सिंह और जालिम सिंह के दूसरे बेटे गोरधनदास की बातों मे आकर उसके विरुद्ध अभियान छेड दिया ! लेकिन अंग्रेजों का साथ हमेशा जालिम सिंह के साथ बना रहा ! 1821 के मंगरोल युद्ध मे जेम्स टोड ने झाला जालिम का साथ दिया ! इस युद्ध मे महाराव का छोटा बेटा पृथ्वी सिंह मारा गया ! महाराव किशोर सिंह बूंदी होते हुए नाथद्वारा चले गए !
झाला जालिम सिंह ने हमेशा की तरह स्वामी भक्ति दिखाई और राजगद्दी पर महाराव की खड़ाऊ रख कर कहा कि जब तक मेरे स्वामी नहीं आते तब तक खड़ाऊ ही शासन करेगी ! बाद मे उदयपुर महाराजा ने दोनों के बीच समझौता करा दिया ! 1822 मे किशोर सिंह वापस अपने राज्य मे लौट आया और पॉलिटिकल एजेंट और जालिमसिंह ने उनका स्वागत किया और जालिम सिंह ने अपने बेटे माधोसिंह को बहुत सुनाई ! 1824 मे जालिम सिंह की मृत्यु हो गई वह 21 साल की उम्र मे कोटा की सेवा मे आया था और 85 साल की उम्र मे उसके मृत्यु हुई ! 1828 मे महाराव किशोर सिंह की भी मृत्यु हो गई !उसके कोई पुत्र नहीं था इसलिए पृथ्वीसिंह का बेटा रामसिंह कोटा का राजा बना !
1833 ई. मे झाला माधोसिंह भी मर गया !और उसका बेटा कोटा राज्य का नया फौजदार बना ! उसका नाम झाला मदनसिंह था !
कोटा महाराव रामसिंह ( द्वितीय ) और फौजदार झाला जालिम सिंह के बीच बढ़ते मतभेद की वजह से अंग्रेजों ने इस झगड़े को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए मदन सिंह के लिए कोटा राज्य से वह परगने अलग कर के नया राज्य बनाया जो झाला जालिम सिंह के समय कोटा राज्य मे मिलाए गए थे ! इस प्रकार कोटा से अलग होकर एक नई रियासत झालावाड़ बनी !
1857 मे कोटा मे अंग्रेजों के खिलाफ भारी विद्रोह हुआ और आंदोलनकारियों मे महाराव को भी किले मे नजर बंद कर दिया और अग्रेजी एजेंट बर्टन और उसकी बेटों हत्या कर दी ! बाद मे अंग्रेजों ने विद्रोह का दमन कर के महाराव को भी दण्ड के रूप मे उनकी तोपों की सलामी को 21 से 17 कर दिया ! 1863 ई मे उनका देहांत हो गया ! और उनका बेटा शत्रुशाल ( द्वितीय ) राज्य बना ! 1888 ई. मे शत्रुशाल निः संतान मर गया ! अतः उसने कोटड़ा के उदयसिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाया था ! जो बिशनसिंह का वंशज था जिसे अंता की जागीर दी गई थी ! उम्मेद सिंह, बिशन सिंह के पाँचवे पुत्र चैनसिंह जे प्रपौत्र छगन सिंह का बेटा था

15 वर्ष की आयु मे उम्मेद सिंह कोटा का राजा बना ! इनके शासन काल मे ही अंग्रेजों ने झालावाड़ के राजा जालिम सिंह ( द्वितीय ) से नाराज होकर झालावाड़ के 15 परगने कोटा राज्य को वापस कर दिए थे ! इनके समय ही रानी विक्टोरिया की मृत्यु हुई थी ! जॉर्ज पंचम भी इनके समय ही भारत आए थे , इनके बुलावे पर जॉर्ज पंचम की पत्नी मेरी कोटा भ्रमण पर आई थी !
इन्हे आधुनिक कोटा का निर्माता कहा जाता है ! इसे कोटा शाहजहाँ भी भी कहा जाता है ! यह प्रजा के साथ बहुत घुल मिल कर रहते थे और बहुत प्रसिद्ध महाराजा हुए ! इनकी मृत्यु 1940 ई मे हो गई

भीमसिंह 1940 मे कोटा के राजा बने ! यह कोटा के अंतिम राजा थे ! इन्होंने कोटा राज्य को राजस्थान संघ मे विलय कर दिया और उसके पहले राजप्रमुख बने बाद मे इन्हे उपराजप्रमुख बना दिया गया ! 1971 ई. मे इन्दिरा गांधी ने सभी भारतीय राजाओ को दिए जाने वाले प्रीवियस खत्म कर सभी राजाओ की मान्यता खत्म कर दी !
भीम सिंह की मृत्यु 20 जुलाई 1991 मे हुई और उनके एकलौते बेटे बृजराज सिंह का राज्याभिषेक हुआ !