झालावाड़ का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है ,झालावाड़ 1838 ई.मे स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था । इसके जो नये शासक थे अगर हम उनका इतिहास देखे तो वह ई. 1488 में काठियावाड़ क्षेत्र में हलवाड़ में छोटी सी जागीर स्थापित करने वाले राजधर के वंशज थे। प्रमाण मिलता है की इस वंश के आठवें राजकुमार के पुत्र भावसिंह था। भावसिंह हलवाड़ छोड़कर अजमेर आ गया जहाँ उसने सेवाड़ के सिसोदिया ठाकुर की लड़की से विवाह किया। भावसिंह के एक पुत्र तथा एक पुत्री हुई। पुत्र का नाम माधोसिंह था । माधोसिंह अजमेर से कोटा आ गया । उसको कोटा नरेश भीमसिंह नन्ता की जागीर दी थी। माधोसिंह को कोटा की सेना में फौजदार तथा कोटा दुर्ग का दुर्गपति भी नियुक्त किया गया था । उसकी बहन का विवाह कोटा नरेश के सबसे बड़े पुत्र अर्जुनसिंह से हुआ। इस विवाह के बाद कोटा राजपरिवार के कनिष्ठ सदस्य माधोसिंह को मामा कहकर बुलाते थे ।

माधोसिंह के बाद उसका पुत्र मदनसिंह, मदनसिंह के बाद मदनसिंह का पुत्र हिम्मतसिंह और हिम्मत सिंह के बाद हिम्मतसिंह का भतीजा जालिमसिंह ई. 1758 में कोटा का फौजदार नियुक्त हुआ। उस समय जालिमसिंह की उम्र मात्र 18 वर्ष थी। फौजदार बनने के तीन वर्ष बाद 1761 मे उसने भटवाड़ा के युद्ध में जयपुर की सेना को परास्त किया जिस कारण कोटा के दरबार में इसका वर्चस्व स्थापित हो गया.किन्तु कुछ ही समय बाद किसी लड़की से प्रेम सम्बन्धों को लेकर कोटा नरेश महाराव गुमानसिंह तथा फौजदार जालिमसिंह के बीच मत भेद हो गए । जालिमसिंह को कोटा राज्य की सेवाओं से हटा दिया गया। जालिम सिंह कोटा छोड़कर उदयपुर चला गया। उसने उदयपुर के महाराणा का विश्वास हासिल किया। महाराणा ने जालिमसिंह को राजराणा की उपाधि दी। उधर जालिमसिंह को कोटा से अनुपस्थित देखकर मराठों ने कोटा पर आक्रमण करने के लिए उसे घेर लिया । इस पर कोटा महाराव ने जालिससिंह को फिर से कोटा बुला लिया। जब कोटा नरेश गुमानसिंह आखरी साँसे ले रहा था तब उसने जालिमसिंह को बुलाया ओर कहा कि मेरा पुत्र उम्मेदसिंह और कोटा राज्य अब तेरे संरक्षण में है। इन दोनों की रक्षा करना। इस प्रकार ई. 1771 से जालिमसिंह कोटा राज्य का वास्तविक शासक बन गया। उसने 50 वर्ष कोटा का राज्य चलाया और उसकी चहुंमुखी उन्नति की। उसके शासन काल में कोटा राज्य की गणना जोधपुर, जयपुर एवं उदयपुर आदि राज्यों की श्रेणी में होने लगी ।
जालिमसिंह भारतीय इतिहास गगन का एक अद्भुत एवं चमकीला सितारा था! संसार में से लोग कम ही पैदा होते हैं। झालावाड़ का इतिहास जालिमसिंह की समझदारी ,बहादुरी ,प्रतिष्ठा से भरा हुआ है , वह जीवन भर काम में लगा रहा। उसका सबसे बड़ा गुण उसकी वाकपटुता थी !मेवाड़ की सेवा में रहते हुए एक बार उसने मराठों से भी युद्ध किया। इस युद्ध में जालिमसिंह गिरफ्तार भी हुआ लेकिन उसने मराठा सेनापति सिन्धिया के अफसरों से अच्छी मित्रता बना ली। मराठा अधिकारी लालाजी बल्लाह जिसे राजपूतों से चौथ वसूलने का काम दिया गया था, वह तो उसका परम मित्र बन गया ! इस प्रकार उसके साथ मराठों की शक्ति भी आ गई थी ,यही कारण था कि उसे काम का आदमी समझकर कोटा नरेश ने पुनः अपने पूर्व पद पर नियुक्त किया था अपने 45वर्ष शासनकाल में जालिमसिंह ने कोटा राज्य की आय 4 लाख से 40 लाख प्रतिवर्ष पहुँचा दी। हुत विनम्र बना रहता था और सबके दिल और दिमाग पर शासन करता था। चारों ओर उसकी बुद्धिमत्ता के चर्चे थे। उसने कोटा राज्य के जागीरदारों पर लगान कसी, दृढ़ निश्चय के साथ राजस्व इकट्ठा किया, किसानों को अधिक से अधिक भूमि जोतने के लिये उत्साहित किया, राजकीय नौकरों को निकम्मेपन के लिये दण्डित किया, राजस्व चोरी एवं काम चोरी पर कड़ा अंकुश लगाया और कोटा राज्य के मरियल घोड़े को स्वस्थ एवं मजबूत अश्व बनाकर खड़ा कर दिया। उसने सम्पूर्ण भारत के सबसे बड़े बादशाह से लेकर सबसे खस्ताहाल राजकुमार तक से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित किये। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी प्रतिष्ठा थी।
अहिल्या बाई की मृत्यु के बाद जसवंत राव होल्कर मराठों की होल्कर शाखा का नेता बना तो उसने कोटा पर बुरी नजर डालना शुरू कर दी। उस समय कोटा राज्य सिन्धिया,पंवार तथा होल्कर तीनों ही मराठा शाखाओं को थोड़ा बहुत धन देता था ताकि वे कोटा राज्य पर आक्रमण न करें और जालिम सिंह शांतिपूर्वक अपना काम करता रहे। जब होल्कर ने कोटा पर नजर डाली तो जालिम सिंह ने उस समय के सबसे ताकतवर पिण्डारी (ठग) अमीर खान की सेवायें प्राप्त कीं। जालिमसिंह ने अमीर खाँ के परिवार को शेरगढ़ का दुर्ग में दे दिया ओर उन्हे वहा रखा,इस प्रकार पिण्डारियों का समर्थन कोटा राज्य को प्राप्त हो गया। पिण्डारी इतने दुष्ट एवं क्रूर थे कि मराठे भी उनसे दूर ही रहना चाहते थे। जालिम सिंह ने अनेक पड़ौसी राज्यों से परगने पट्टे पर प्राप्त किये ताकि उनका कुप्रबन्ध दूर करके उनकी कृषि,उद्योग,व्यापार एवं राजस्व व्यवस्था को मजबूत किया जा सके। इन परगनों का शासन चलाने के लिये उसने योग्य अधिकारियों की नियुक्ति की। ऐसा करने से जालिमसिंह की आय,प्रतिष्ठा,ताकत और प्रभाव खूब बढ़-चढ़ गया। उसने कई पुराने नगरों की दशा सुधारी तथा नये नगर स्थापित किये । झालरापाटन शहर की सुन्दरता का सारा श्रेय जालिम सिंह को जाता है। यह नगर उस समय भारत के सुन्दरतम नगरों में गिना जाने लगा। ई. 1791 में उसने झालावाड़ नामक नगर बसाया । ई. 1817 में जालिमसिंह ने पिंडरियों के उपद्रव से तंग आकर
ब्रिटिश सरकार से सन्धि की ताकि पिण्डारियों का सफाया किया जा सके। इस प्रकार दिसम्बर 1817 से कोटा राज्य मराठों के स्थान पर अंग्रेजों को कर देने लगा। ई.1817 में जब पिण्डारी युद्ध लड़ा गया तो उसमें जालिमसिंह ने बड़ी भारी भूमिका अदा की। उसके पराक्रम और सेवाओं के बदले में अंग्रेजों द्वारा मराठों से चार परगने छीनकर जालिमसिंह को दिये गये ।
उसने अंग्रेजों से संधि कर उसमें दो पूरक धाराएं जुड़वाँ भी जुड़वा दी जिसके अनुसार कोटा के महाराव उम्मेदसिंह के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र तथा उसके वंशज ही कोटा राज्य के शासक होंगे.राज्य की सारी सत्ता झाला जालिम सिंह और उसके बाद जालिमसिंह के वंशजों के पास रहेगी,इसके बाद कोटा का महाराव नाममात्र का शासक रह गया.महाराव उम्मेदसिंह की मृत्यु के बाद नए महाराव किशोरसिंह ने जालिमसिंह के अधिकारों को चुनौती दी. जिससे दोनों में मतभेद ओर झगड़े हो गए,कर्नल टॉड ने सदैव जालिमसिंह का पक्ष लिया. 1821 ई दोनों के मध्य मांगरोल नामक स्थान पर युद्ध हुआ,कर्नल टॉड ने जालिमसिंह की सहायतार्थ सेना भेजी,युद्ध हारने के बाद महाराव नाथद्वारा चले गए .अंत में मेवाड़ महाराणा भीमसिंह की अध्यक्षता से महाराव और जालिमसिंह में समझौता हो गया.
जिसके अनुसार यह समझौता हुआ कि जालिमसिंह महाराव के निजी कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा,और राजकाज में महाराव दखल नहीं करेगे,
ई. 1824 में जालिमसिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र माधोसिंह उसका उत्तराधिकारी बना। 1828 में महाराव किशोरसिंह की भी मृत्यु के बाद उसका भतीजा रामसिंह कोटा का राजा बना। जालिमसिंह का पुत्र माधोसिंह भी शीघ्र ही मर गया और माधोसिंह का पुत्र मदनसिंह उसकी जगह नियुक्त हुआ। ई. 1834 में कोटा नरेश रामसिंह और जालिमसिंह के पौत्र मदनसिंह के मध्य मतभेद हो गए ! अंग्रेजों ने कोटा नरेश से बातचीत करके कोटा राज्य में से जालिमसिंह के शासनाधिकार वाले क्षेत्रों को निकाल कर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर दी। इस नये राज्य में 17 परगने थे जिनकी वार्षिक आय 12 लाख रुपये थी। मदनसिंह इस राज्य का प्रथम शासक नियुक्त हुआ।
8 अप्रैल 1838 को झालावाड़ नरेश मदनसिंह ने अंग्रेजों से संधि कर उन्हे अपने राज्य का संरक्षक बना दिया तथा इस संधि के अनुसार मदनसिंह की राज राणा की उपाधि स्वीकार की गई। उसका दर्जा राजपूताने के दूसरे राजाओं के समान माना गया। उसके वंशजों को ही झालावाड़ राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी माना गया। झालावाड़ राज्य द्वारा अंग्रेजों को 80 हजार रुपया वार्षिक कर तथा आवश्यकता पड़ने पर सैन्य सहायता देने का भी वचन दिया गया।
ई. 1845 में मदनसिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र पृथ्वीसिंह झालावाड़ की गद्दी पर बैठा। ई. 1857 के क्रांति में पृथ्वीसिंह ने अंग्रेजों की मदद की तथा अनेक शरणागत अंग्रेज अधिकारियों की जान बचाई। पुरस्कार स्वरूप ई. 1862 में पृथ्वीसिंह को उत्तराधिकारी गोद लेने का अधिकार दिया गया। ई. 1866 में पृथ्वीसिंह ने झालावाड़ राज्य में रेल बिछाने के लिये निःशुल्क भूमि उपलब्ध कराई तथा रेलगाड़ी में जाने वाले माल पर चुंगी माफ कर दी। पृथ्वीसिंह के कोई पुत्र नहीं था अतः उसने अपना उत्तराधिकारी गोद लेना चाहा। इस पर कोटा नरेश ने आपत्ति उठाई कि मदनसिंह के वंशजों में से किसी भी राजा के पुत्र न होने पर झालावाड़ राज्य पुनः कोटा को लौटाया जाना चाहिये किन्तु अंग्रेजों ने कोटा को यह कह कर शांत कर दिया कि झालावाड़ का राजा राजस्थान के दूसरे राजाओं के समान ही अपनी संप्रभुता रखता है अतः कोटा राज्य का झालावाड़ राज्य पर कोई अधिकार नहीं है। इस प्रकार ई. 1873 में पृथ्वीसिंह ने काठियावाड़ के बडवान से बखतसिंह नामक बालक को गोद लिया जो उसी परिवार से था जिस परिवार से पृथ्वीसिंह के पूर्वज काठियावाड़ से चलकर राजस्थान आये थे।29 अगस्त 1875 को महाराज राणा पृथ्वीसिंह की मृत्यु हो गई।
पृथ्वीसिंह की मृत्यु के समय पृथ्वीसिंह की रानी गर्भवती थी अतः राजगद्दी खाली रखी गई किन्तु बाद में रानी के गर्भ से कोई बालक पैदा नहीं हुआ अतः 24 जून 1876 को बख्तसिंह जालिमसिंह (द्वितीय) के नाम से झालावाड़ का राजा बना। अंग्रेजों ने भी उसे झालावाड़ का राजा स्वीकार कर लिया। ई. 1881 में अंग्रेजों ने झालावाड़ राज्य से नमक की सन्धि की इसके अनुसार झालावाड़ राज्य न तो स्वयं नमक बना सकता था और न किसी अन्य राज्य से नमक मंगा सकता था। पूरे राज्य में केवल ब्रिटिश कम्पनियों का ही नमक प्रयोग में लाया जा सकता था। इसके बदले में अंग्रेज सरकार झालावाड़ के राजा को 7000 रुपया तथा प्रत्येक जागीरदार को 250 रुपया महीना चुकाने लगी ।
ई. 1876 में जब बखतसिंह जालिमसिंह के नाम से गद्दी पर बैठा, उस समय उसकी आयु मात्र साढ़े दस वर्ष थी। अतः नवम्बर 1883 में उसके वयस्क होने पर 21 फरवरी 1884 को राज्यके सारे अधिकार उसे सौंप दिये गये। उसके साथ भी वही शर्तें रखी गईं जो अलवर के महाराव राजा मंगलसिंह तथा धौलपुर के महाराजा राणा निहालसिंह के साथ रखी गईं। इन शर्तों के अनुसार कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय करने से पहले महाराजा के लिये पोलिटिक्ल एजेण्ट की सहमति प्राप्त करना तथा कोई भी प्रशासनिक बदलाव लाने के लिये पूरी तरह एजेण्ट पर निर्भर रहना आवश्यक था। जालिमसिंह ने उस समय तो ये बातें स्वीकार कर लीं किन्तु अंग्रेजी एजेण्ट द्वारा राज्य के मामलों में अड़ंगे लगाना उसे पसन्द नहीं आया और जल्दी ही उसका अंग्रेजों के साथ मडभेद हो गया। अतः अंग्रेजों ने उसे दण्डित करने के लिये 21 फरवरी 1884 से पहले की प्रशासनिक व्यवस्था लागू कर दी। यह पुरानी व्यवस्था उसके नाबालिग रहते समय की गई थी जिसके तहत पोलिटिक्ल एजेण्ट एक कौंसिल के माध्यम से सरकारी काम-काज चलाता था। यह व्यवस्था सितम्बर 1887 से लागू की गई और नवम्बर 1892 तक चालू रही। जब उसने देख लिया कि अंग्रेजों के सामने पार पड़ने वाली नहीं है तब उसने अंग्रेजों से पुनः वायदा किया कि वह अंग्रेजों की इच्छानुसार ही शासन करेगा। इस पर अंग्रेजों ने राज्य के कुछ अधिकार पुनः उसे सौंप दिये । जुलाई 1894 में राज्य के सारे अधिकार उसे दे दिये गये। स्वाभिमानी जालिमसिंह अधिक समय तक अंग्रेजों को प्रसन्न नहीं रख सका और शीघ्र ही पुनः खट-पट हो गई। अंग्रेजों ने भी उससे पूरी तरह निबटने का फैसला कर लिया और 22 मार्च 1896 को राजा के पद से हटा दिया। धूर्तता की जितनी भी चालें अंग्रेज चल सकते थे, चली गईं। उन्होंने 1838 की सन्धि को पुनः खोला जिसके तहत जालिमसिंह (प्रथम) के वंशज राजा की संतान को ही झालावाड़ का उत्तराधिकारी माना गया था। अतः इस सन्धि की आड़ में शाहाबाद, खानपुर, अकलेरा तथा मनोहरथाना आदि सारे क्षेत्र कोटा राज्य को लौटा दिये गये। जबकि चौमहला, पाटन तथा सुकेत आदि क्षेत्रों को मिलाकर एक नया राज्य बनाया गया तथा जालिमसिंह प्रथम की सेवाओं का आदर करने का बहाना लेकर उसके परिवार के भरण-पोषण के लिये फतहपुर के ठाकुर छत्र साल के पुत्र कुंवर भवानीसिंह को इस नये राज्य का राजा बनाया गया। कुंवर भवानीसिंह जालिमसिंह प्रथम के वंशजों में से ही था। इस प्रकार 1 जनवरी 1899 को परगनों का स्थानान्तरण हो गया तथा झालावाड़ का नवीन किन्तु खण्डित राज्य अस्तित्व में आया।

6 फरवरी 1899 को भवानीसिंह नये झालावाड़ राज्य का राजा बना तथा उसे राज चलाने की पूरी शक्तियां दी गई। भवानीसिंह को अपना उत्तराधिकारी गोद लेने के भी अधिकार दिये गये तथा राज्य द्वारा 30 हजार रुपया वार्षिक शुल्क ब्रिटिश सरकार को दिया जाना निश्चित हुआ । इस राज्य में देशी सिक्कों का प्रचलन बन्द कर दिया गया तथा सिक्के एवं कानून अंग्रेजों द्वारा बनाये गये ही चल सकते थे। नमक नीति वही पुरानी वाली रखी गई किन्तु इसके बदले राज राणा को 7000 रुपया के स्थान पर 2500 रुपया वार्षिक ही देना तय हुआ। अफीम की तस्करी पर रोक लगाने के लिये राजराणा अंग्रेजी सरकार की सहायता करने के लिये बाध्य किया गया। अक्टूबर 1900 में झालावाड़ राज्य में ब्रिटिश पोस्टल पद्धति लागू की गई। भवानीसिंह के गद्दी पर बैठते ही राज्य में भयानक अकाल पड़ा। इस कठिन समय में भवानीसिंह ने प्रजा की पूरी सेवा की। उसने कई स्कूल चालू करवाये तथा निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की। महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये वह राजकोष से साड़ियां देता था। झालावाड़ में उसने नगर पालिका की स्थापना की। आधुनिकीकरण के काम में भवानीसिंह समय से भी आगे चलने वाला सिद्ध हुआ। उसने राज्य के पिछड़े लोगों के कल्याण के लिये कई काम करवाये। उसने बहुत प्रयास किया कि झालावाड़ राज्य के जो परगने कोटा राज्य को लौटा दिये गये थे वे पुनः झालावाड़ को प्राप्त हो जायें किन्तु वह असफल रहा। जब उसके सारे प्रयास नकार दिये गये तब वह व्यथित हृदय लेकर ई. 1929 में मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसके बाद उसका पुत्र राजेन्द्र सिंह झालावाड़ राज्य का महाराज राणा बना। राजेन्द्रसिंह एक पढ़ा लिखा युवक था। वह कवि था। हरिजनों के कल्याण के लिये उसने बहुत काम किया। उसके शासनकाल में पुलिस व सेना की व्यवस्था में परिवर्तन किया गया। हाईकोर्ट का निर्माण करवाया गया तथा झालावाड़ और झालरापाटन में बिजली लगवाई गई। छोटी काली सिंध नदी पर गंगधार के पास पुल बनाया गया। सितम्बर 1943 में राजेन्द्रसिंह की मृत्यु हो गई तथा उसका पुत्र हरीशचन्द्र झालावाड़ की गद्दी पर बैठा। उसके शासन काल में लोकप्रिय सरकार का गठन हुआ । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कोटा, बून्दी, टाँक,झालावाड, शाहपुरा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, किशनगढ़ तथा कुशलगढ़ नामक 10 रियासतों ने मिलकर एक संघ बनाने की घोषणा की। इस संघ का राजप्रमुख कोटा नरेश को तथा प्रधानमंत्री गोकुलनाथ असावा को बनाया गया। 25 मार्1948 को केन्द्रीय मंत्री एन.वी. गाडगिल ने इस संघ का उद्घाटन किया। बाद में इस संघ का विलय राजस्थान में हो गया।

झालावाड़ के अंतिम महाराजा हरीशचंद्र पहले तो भारत सरकार की विदेशी सेवा मे रहे बाद मे उन्होंने नोकरी छोड़ के राजस्थान विधानसभा का चुनाव लड़ा ओर जीते !उन्हे सरकार मे मंत्री बनाया गया